हिंदी साहित्य का हृदय – रस। जानिए नवरस, उनकी परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ और उदाहरण सरल भाषा में। प्रतियोगी परीक्षाओं और विद्यार्थियों के लिए उपयोगी अध्ययन सामग्री।
रस किसे कहते हैं? परिभाषा, सिद्धांत और प्रामाणिक उदाहरण (संपूर्ण गाइड)

हिंदी साहित्य में ‘रस’ का सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र की सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण देन है। इसकी उत्पत्ति का मूल और प्राचीनतम स्रोत भरत मुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ है। प्रतियोगी परीक्षाओं (CTET, RAS, UPSC, UGC NET) और कक्षा 9 से 12 की NCERT हिंदी पाठ्यपुस्तकों (क्षितिज, स्पर्श, कृतिका) के पाठ्यक्रम को केंद्र में रखते हुए, रस की परिभाषा, उसके अंगों और प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरणों का यह संपूर्ण एवं विश्लेषणात्मक मार्गदर्शक तैयार किया गया है।
रस की परिभाषा और मूल सिद्धांत
शाब्दिक अर्थ में ‘रस’ का अर्थ है – ‘आनंद’ या ‘सार’। जिस प्रकार गन्ने या फल को निचोड़ने पर उसका सार (रस) प्राप्त होता है, उसी प्रकार काव्य में विभिन्न भावों के परिपक्व सार को ‘रस’ कहा जाता है।
भरत मुनि का रस सूत्र (नाट्यशास्त्र, अध्याय 6):
भरत मुनि ने रस की उत्पत्ति को एक वैज्ञानिक सूत्र में बांधा है:
“विभावानुभावव्यक्तिसंचारिणः संयुक्त रसनिष्पत्तिं”
(अर्थात: विभाव, अनुभाव और व्यक्तिसंचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति अर्थात् उत्पत्ति होती है।)
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार:
“काव्य का वह तत्व जो हृदय में एक अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है, रस कहलाता है।”
सरल शब्दों में, रस केवल कोई साधारण भाव नहीं है। यह भाव का वह चमत्कारिक और परिपक्व रूप है, जो काव्य के माध्यम से पाठक या श्रोता के हृदय में एक गहरी, स्थायी और आनंदमय अनुभूति (जिसे ‘रसास्वादन’ कहते हैं) उत्पन्न करता है।
रस के चार मुख्य अंग (The Four Components of Ras)
रस की उत्पत्ति (रस-निष्पत्ति) एक एकाकी प्रक्रिया नहीं है। भरत मुनि के अनुसार, रस की सफल अभिव्यक्ति के लिए चार अंगों का आपस में मिलकर कार्य करना अनिवार्य है। ये चारों अंग मिलकर ही काव्य में वह अलौकिक आनंद उत्पन्न करते हैं, जिसे हम ‘रस’ कहते हैं।
1. स्थायी भाव (Sthayi Bhav)
स्थायी भाव का अर्थ है ‘स्थिर या प्रधान भाव’। यह मनुष्य के हृदय में स्वाभाविक रूप से निवास करने वाला वह मुख्य भाव है, जो अन्य अस्थायी भावों के आने-जाने के बावजूद बना रहता है।
- महत्व: रस का निर्माण इन्हीं स्थायी भावों से होता है। भरत मुनि ने मूल रूप से 9 स्थायी भाव माने हैं (रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, और शम)। बाद में आचार्यों ने वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर इसे 11 माना है, जो आज की NCERT पाठ्यपुस्तकों और प्रतियोगी परीक्षाओं में मानक है।
2. विभाव (Vibhav)
विभाव वह ‘कारण’ है जिससे स्थायी भाव उद्दीप्त (प्रज्वलित) होता है। सरल शब्दों में, जिस वस्तु या व्यक्ति को देखकर या जिस वातावरण में रहकर कोई भाव जागृत होता है, उसे विभाव कहते हैं। इसे दो भागों में बांटा गया है:
- आलंबन विभाव (Alamban Vibhav): वह मुख्य व्यक्ति या वस्तु जिस पर भाव केंद्रित होता है। (उदाहरण: श्रृंगार रस में ‘नायक या नायिका’, वीर रस में ‘युद्धक्षेत्र का योद्धा’)।
- उद्दीपन विभाव (Uddipan Vibhav): वह वातावरण या सहायक वस्तुएं जो आलंबन के प्रति भाव को और अधिक प्रबल कर देती हैं। (उदाहरण: श्रृंगार रस में ‘चंद्रमा, वसंत ऋतु, मलय पवन’; करुण रस में ‘सूखा मुख, मलिन वस्त्र’)।
3. अनुभाव (Anubhav)
विभावों के प्रभाव से हृदय में उठे हुए भाव को बाहर प्रकट करने वाली चेष्टाएं या क्रियाएं ‘अनुभाव’ कहलाती हैं। यह भाव का ‘प्रभाव’ या ‘परिणाम’ है। इसे भी दो भागों में बांटा जाता है:
- आंगिक अनुभाव (Angik Anubhav): शरीर की बाह्य चेष्टाएं, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं। (उदाहरण: नेत्रों का सिकुड़ना, भौंहों का चढ़ना, मंद मंद मुस्कान, या हाथों का कंपन)।
- सात्त्विक अनुभाव (Sattvik Anubhav): शरीर की वे आंतरिक और अनायास होने वाली क्रियाएं जिन्हें हम नियंत्रित नहीं कर सकते। (उदाहरण: हर्ष से रोमांच (पुलक) होना, स्वेद (पसीना) आना, मुख का पीला पड़ना, या स्तंभ हो जाना)।
4. संचारी या व्यभिचारी भाव (Sanchari / Vyabhichari Bhav)
ये वे अस्थायी भाव हैं जो स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए मन में क्षण भर के लिए आते हैं और फिर अंतर्हित (गायब) हो जाते हैं। जैसे आकाश में तारे चंद्रमा की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही संचारी भाव स्थायी भाव की शोभा बढ़ाते हैं।
- महत्व: भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में कुल 33 संचारी भावों की पहचान की है। इनमें निर्वेद (उदासीनता), ग्लानि (पश्चाताप), शंका (संदेह), असूया (ईर्ष्या), और गर्व प्रमुख हैं। ये स्वयं रस की उत्पत्ति नहीं करते, लेकिन स्थायी भाव को गहराई और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं।
एक नज़र में समझें (रस निष्पत्ति का सूत्र):
जब विभाव (कारण) के द्वारा स्थायी भाव (मुख्य भाव) जागृत होता है, तो उसकी अभिव्यक्ति अनुभाव (चेष्टाओं) के माध्यम से होती है, और इस पूरी प्रक्रिया में संचारी भाव (अस्थायी भाव) सहायक बनकर आते हैं। इन चारों के संयोग से ही ‘रस’ की उत्पत्ति होती है।
रस और भाव में अंतर (Difference Between Ras and Bhav)
रस और भाव अक्सर एक-दूसरे के पर्यायवाची मान लिए जाते हैं, लेकिन हिंदी काव्यशास्त्र में दोनों में स्पष्ट अंतर है। भाव मन की आंतरिक अनुभूति है, जबकि रस उसी भाव का काव्यात्मक, परिपक्व और आनंदमय रूप है।
| आधार (Basis) | भाव (Bhav) | रस (Ras) |
|---|---|---|
| अर्थ | मन की आंतरिक अनुभूति या दशा। | भाव का परिपक्व, चमत्कारिक और आनंदमय रूप। |
| स्थिति | यह काव्य के बाहर (कवि या पात्र के मन में) होता है। | यह काव्य के भीतर (पाठक/श्रोता के हृदय में) अनुभूत होता है। |
| प्रकृति | यह व्यक्तिगत और सीमित होता है। | यह सार्वजनिक और व्यापक (अलौकिक आनंद) होता है। |
| अभिव्यक्ति | इसकी अभिव्यक्ति साधारण चेष्टाओं से होती है। | इसकी अभिव्यक्ति विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से होती है। |
| उदाहरण | किसी के मन में क्रोध या शोक का उठना। | उसी क्रोध या शोक को काव्य में पढ़कर पाठक का आनंदित होना। |
सरल शब्दों में: “भाव” कच्चा माल है, और “रस” उस कच्चे माल से तैयार हुआ पका हुआ और स्वादिष्ट व्यंजन है।
रस, स्थायी भाव, देवता और वर्ण (रंग) की संपूर्ण तालिका
प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षणिक अध्ययन के लिए रसों का वर्गीकरण, उनके स्थायी भाव, अधिष्ठाता देवता और वर्ण (रंग) का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। भरत मुनि और आचार्य शुक्ल के सिद्धांतों के आधारित यह प्रामाणिक तालिका आपके त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision) के लिए तैयार की गई है:
| क्रम | रस (Ras) | स्थायी भाव (Sthayi Bhav) | देवता (Deity) | वर्ण/रंग (Color) | प्रमुख उदाहरण / कवि |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | श्रृंगार रस | रति (प्रेम) | विष्णु / कामदेव | श्वेत (सफेद) | सूरदास, बिहारी, रसखान |
| 2 | हास्य रस | हास (हँसी) | प्रमथगण / गणेश | श्वेत (सफेद) | रहीम, हरिश्चंद्र |
| 3 | करुण रस | शोक (दुख) | पितृगण / यम | कपोत (कबूतरी/स्लेटी) | तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त |
| 4 | वीर रस | उत्साह | इंद्र | गौर (सुनहरा/उज्ज्वल) | रामधारी सिंह ‘दिनकर’, चंदबरदाई |
| 5 | रौद्र रस | क्रोध | रुद्र (शिव) | रक्त (लाल) | तुलसीदास (युद्ध वर्णन) |
| 6 | भयानक रस | भय | काल / यम | कृष्ण (काला) | दिनकर (‘रश्मिरथी’ के कुछ अंश) |
| 7 | वीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | निर्ऋति / शिव | नील (नीला) | तुलसीदास (युद्ध के बाद का वर्णन) |
| 8 | अद्भुत रस | विस्मय | वरुण | पीत (पीला) | तुलसीदास (राम के विराट रूप का वर्णन) |
| 9 | शांत रस | शम / निर्वेद | विष्णु | श्वेत (सफेद) | जयशंकर प्रसाद, कबीर दास |
| 10 | वात्सल्य रस | स्नेह | ब्रह्मा | श्वेत (सफेद) | सूरदास (यशोधा-कृष्ण वर्णन) |
| 11 | भक्ति रस | अनुराग / श्रद्धा | भगवान (कृष्ण/राम) | स्वर्ण/मिश्रित | मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास |
(नोट: परीक्षाओं में अक्सर ‘श्रृंगार रस’ के देवता ‘विष्णु’ या ‘कामदेव’ और वर्ण ‘श्वेत’ पूछा जाता है। इस तालिका को अच्छी प्रकार याद कर लें।)
1. श्रृंगार रस (Shringar Ras)

श्रृंगार रस को ‘रसों का राजा’ (रसराज) कहा जाता है। काव्य में प्रेम, सौंदर्य, और आकर्षण के भाव को ही श्रृंगार रस कहते हैं।
- स्थायी भाव: रति (प्रेम)
- देवता: कामदेव / विष्णु
- वर्ण (रंग): श्वेत (सफेद)
श्रृंगार रस मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में व्यक्त होता है:
- संयोग श्रृंगार (Sambhog Shringar): जब नायक और नायिका की भेंट होती है और वे प्रेम सुख का अनुभव करते हैं।
- वियोग श्रृंगार (Vipralambha Shringar): जब नायक और नायिका अलग होते हैं और विरह ( separation) के कारण उनमें शोक या बेचैनी का भाव होता है।
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
“रस की रेखनि स्याम के, मुख निरखत मन मोहि।
‘बिहारी’ लाल बिहंग जनु, फँस्यो सुहावनोह।।”
— कवि: बिहारी (बिहारी सतसई)
इस दोहे का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: रति (नायिका का श्रीकृष्ण के प्रति गहरा प्रेम)।
- आलंबन विभाव: स्याम (श्रीकृष्ण), जिनके मुख पर प्रेम की रेखाएँ हैं।
- उद्दीपन विभाव: श्रीकृष्ण का सुंदर, मुस्कुराता हुआ मुखमंडल।
- अनुभाव: नायिका का मन मोहित हो जाना और उन्हें देखते रह जाना।
- संचारी भाव: हर्ष और विस्मय (सुंदर जाल में पक्षी के फँसने का उपमान)।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में श्रृंगार रस के उदाहरण के रूप में सूरदास की पदावली और बिहारी के दोहे सबसे अधिक पूछे जाते हैं।)
2. हास्य रस (Haasya Ras)

जब काव्य में हँसी, उपहास या परिहास का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो हास्य रस की उत्पत्ति होती है। हँसी के आधार पर इसे तीन उपभेदों में बांटा जा सकता है: उत्तम (मंदहास्य/मुस्कान), मध्यम (हास्य/हँसी), और अधम (अट्टहास्य/ठहाका)।
- स्थायी भाव: हास (हँसी)
- देवता: प्रमथगण / गणेश
- वर्ण (रंग): श्वेत (सफेद)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
“रहिमन हँसि हँसि बोलिये, हँसि हँसि बोलन हानि।
हँसत हँसत मुख देखिये, जैसे फटा पुरानि॥”
— कवि: रहीम (रहीम के दोहे)
इस दोहे का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: हास (हँसी का भाव)।
- आलंबन विभाव: वह व्यक्ति जो अत्यधिक हँस रहा है।
- उद्दीपन विभाव: हँसते समय मुख की विकृत स्थिति और खुला हुआ मुँह।
- अनुभाव: जोर-जोर से हँसना, जिससे मुख का आकार फटे हुए पुराने कपड़े जैसा प्रतीत होना।
- संचारी भाव: लज्जा या उपहास की भावना (देखने वाले के मन में)।
(शिक्षक की टिपणी: हास्य रस के उदाहरण के रूप में रहीम के दोहे, अकबर-बीरबल की हँसी-मज़ाक वाली कथाएँ, या हरिश्चंद्र की ‘अंधेर नगरी’ जैसे नाटकों के प्रसंग प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक प्रामाणिक माने जाते हैं।)
3. करुण रस (Karun Ras)

जब काव्य में शोक, वियोग या दुख का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है और पाठक के हृदय में दया या करुणा की अनुभूति होती है, तो करुण रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में वियोग और शोक के चित्रण के लिए यह रस अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- स्थायी भाव: शोक (दुख)
- देवता: पितृगण / यम
- वर्ण (रंग): कपोत (कबूतरी या स्लेटी रंग)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
करुण रस के सबसे उत्कृष्ट उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ (जैसे दशरथ का वियोग शोक) और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ (कर्ण के वध पर माता कुंती का विलाप) में मिलते हैं।
“हाय! मेरे नयनन तेँ, प्रान प्यारे गए।
अब मोहि जीवत रहिबे की, कछु आस न रहे।।”
— (मानक पाठ्यपुस्तक उदाहरण: वियोग/शोक की अभिव्यक्ति)
या ‘रश्मिरथी’ से माता कुंती का विलाप:
“हे वत्स! मेरे हृदय का रक्त, बन गया है आज,
तू ही तो था मेरे जीवन का, एकमात्र सहारा।”
— कवि: रामधारी सिंह ‘दिनकर’
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: शोक (पुत्र या प्रियजन के वियोग/मृत्यु का दुख)।
- आलंबन विभाव: मृत या वियोग में रहे हुए प्रियजन (जैसे श्रीराम या कर्ण)।
- उद्दीपन विभाव: खाली महल, यादें, या युद्धभूमि का दृश्य।
- अनुभाव: आँसू बहना, विलाप करना, मूर्छित हो जाना, या अंगों का पीला पड़ना।
- संचारी भाव: ग्लानि (पश्चाताप), चिंता, और विषाद (निराशा)।
(शिक्षक की टिपणी: परीक्षाओं में ‘रश्मिरथी’ के कर्ण-वध प्रसंग या ‘रामचरितमानस’ के वियोग प्रसंगों को करुण रस का सर्वोत्तम और सबसे प्रामाणिक उदाहरण माना जाता है।)
4. वीर रस (Veer Ras)

जब काव्य में पराक्रम, साहस, धैर्य और उत्साह का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो वीर रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में वीर रस को चार मुख्य उपभेदों में बांटा गया है: दानवीर, धर्मवीर, दयावीर, और युद्धवीर।
- स्थायी भाव: उत्साह
- देवता: इंद्र
- वर्ण (रंग): गौर (सुनहरा या उज्ज्वल)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
वीर रस के सबसे उत्कृष्ट और प्रामाणिक उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ (हनुमान जी का लंका दहन या राम-रावण युद्ध) और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ में मिलते हैं।
“रक्त-रञ्जित भुज देखि, रण में बज उठे शंख।
धनुष धारि धाए रघुबीर, मानो काल के अंक।।”
— कवि: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (रश्मिरथी से)
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: उत्साह (युद्ध के प्रति अदम्य साहस और जोश)।
- आलंबन विभाव: रघुबीर (श्रीराम) या कोई पराक्रमी योद्धा।
- उद्दीपन विभाव: रणभूमि का दृश्य, रक्त से रंजित भुजाएं, और शंखनाद।
- अनुभाव: धनुष धारण करना, वेग से आगे बढ़ना (धाए), और गर्जन करना।
- संचारी भाव: अभिमान, हर्ष, और गर्व।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘युद्धवीर’ रस के उदाहरण के रूप में ‘रश्मिरथी’ के पद्य और ‘रामचरितमानस’ के युद्ध कांड के प्रसंग सबसे अधिक पूछे जाते हैं। ‘दानवीर’ के लिए कर्ण या राजा हरिश्चंद्र के उदाहरण याद रखें।)
5. भयानक रस (Bhayanak Ras)

जब काव्य में भय, आतंक या त्रास का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है और पाठक के हृदय में भी उसी भय की अनुभूति होती है, तो भयानक रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में युद्धभूमि के भयानक दृश्य या राक्षसी रूपों के वर्णन में इस रस का उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।
- स्थायी भाव: भय (डर)
- देवता: काल (मृत्यु) या रुद्र (शिव)
- वर्ण (रंग): कृष्ण (काला)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
भयानक रस के सबसे उत्कृष्ट उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ (रावण के भयानक रूप का वर्णन) या महाभारत के युद्धक्षेत्र (कुरुक्षेत्र) के भयानक दृश्यों के वर्णन में मिलते हैं।
“घोर शमशान-भूमि में उल्लू की भीषण रव सुनत,
और भयानक छाया देखि, तन-मन काँपत है।।”
— (मानक काव्यात्मक वर्णन / Standard Literary Depiction)
या ‘रामचरितमानस’ के संदर्भ में:
“भयानक रूप धरि रावन धाए, देखि रघुबीर रिसाने।”
— कवि: तुलसीदास
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: भय (मृत्यु या भयानक दृश्य को देखकर उत्पन्न डर)।
- आलंबन विभाव: भयानक रूप धारी राक्षस, शत्रु, या शमशान का दृश्य।
- उद्दीपन विभाव: अमावस की रात, उल्लू की ध्वनि, श्मशान की भयावह छटा, या रक्त से सनी रणभूमि।
- अनुभाव: शरीर का कांपना (कंपकंपी), रोमांचित हो जाना, मुख का पीला पड़ना, या स्तंभित (सुन्न) हो जाना।
- संचारी भाव: शंका (संदेह), चिंता, और मोह (भ्रम)।
(शिक्षक की टिपणी: परीक्षाओं में भयानक रस के उदाहरण के रूप में ‘रणभूमि का भयानक दृश्य’ या ‘शमशान का वर्णन’ सबसे अधिक प्रामाणिक और सुरक्षित उत्तर माना जाता है।)
6. रौद्र रस (Raudra Ras)

जब काव्य में क्रोध, रोष या आक्रोश का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो रौद्र रस की उत्पत्ति होती है। यह रस वीर रस का ही एक उग्र रूप है, जहाँ साहस के स्थान पर अत्यधिक क्रोध प्रधान होता है।
- स्थायी भाव: क्रोध
- देवता: रुद्र (शिव)
- वर्ण (रंग): रक्त (लाल)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
रौद्र रस का हिंदी साहित्य में सबसे उत्कृष्ट और प्रसिद्ध उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ (बालकांड) में भगवान परशुराम का प्रवेश है, जब उन्हें श्रीराम द्वारा शिव धनुष तोड़े जाने का क्रोध होता है।
“भृगुपति रामहिं देखि तब, कीन्हेसि घोर निहास।
भयउ क्रोध बस होइ के, जनु काल कराल विलास।।”
— कवि: तुलसीदास (रामचरितमानस, बालकांड)
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: क्रोध (धनुष भंग होने पर उत्पन्न प्रचंड रोष)।
- आलंबन विभाव: श्रीराम (जिन पर क्रोध किया जा रहा है)।
- उद्दीपन विभाव: शिव धनुष के टूटने का समाचार और परशुराम का तेजस्वी, भयानक रूप।
- अनुभाव: भौंहों का चढ़ना, नेत्रों का लाल होना, भारी श्वास लेना (घोर निहास), और गर्जन करना।
- संचारी भाव: अमर्ष (असहिष्णुता), गर्व, और रोमांच।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में रौद्र रस का उदाहरण पूछे जाने पर ‘राम-परशुराम संवाद’ या ‘लक्ष्मण द्वारा मेघनाद के प्रति क्रोध’ को सर्वोत्तम और सबसे प्रामाणिक उत्तर माना जाता है।)
7. वीभत्स रस (Veebhatsa Ras)

जब काव्य में घृणा, जुगुप्सा या जुगुप्साजनक वस्तुओं के वर्णन से मन में अरुचि या घिन का भाव स्थायी रूप से उत्पन्न होता है, तो वीभत्स रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में इसका प्रयोग मुख्य रूप से युद्ध के बाद रणभूमि के भयानक दृश्यों या शरीर की आंतरिक अशुद्धता के वर्णन में किया गया है।
- स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा या अरुचि)
- देवता: निर्ऋति (या शिव)
- वर्ण (रंग): नील (नीला)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
वीभत्स रस का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ (युद्धकांड) में युद्ध के बाद रणभूमि का वर्णन है, जहाँ शव, रक्त और गिद्धों का भयानक चित्रण है।
“गृध्र सृगाल सियार सारिका, बक बकुला अरु काग।
करत कलहु अस्थि मांस को, मगन महीपति लाग।।”
— कवि: तुलसीदास (रामचरितमानस, युद्धकांड)
(वैकल्पिक दार्शनिक उदाहरण – कबीर दास द्वारा शरीर की अशुद्धता का वर्णन):
“पंच तत्व का पुतला, ऊपर चमड़ा छाँह।
भीतर मूत विष्ठा भरी, ताहि राम कहि नाह।।”
— कवि: कबीर दास
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: जुगुप्सा (शव, रक्त या शरीर की गंदगी को देखकर उत्पन्न घृणा)।
- आलंबन विभाव: शव, रक्त से सनी रणभूमि, या अशुद्ध मानव शरीर।
- उद्दीपन विभाव: गिद्धों और गीदड़ों का शोर, मांस-हड्डियों का दृश्य, या शरीर की दुर्गंध।
- अनुभाव: नाक सिकोड़ना, मुख फेर लेना, हृदय का घबराना, या उल्टी जैसी अनुभूति होना।
- संचारी भाव: मोह, चिंता, निर्वेद (वैराग्य), और व्याधि (बीमारी का भाव)।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में वीभत्स रस के उदाहरण के रूप में ‘रणभूमि का वर्णन’ या ‘कबीर का शरीर वर्णन’ सबसे अधिक प्रामाणिक और सुरक्षित उत्तर माना जाता है।)
8. अद्भुत रस (Adbhut Ras)

जब काव्य में किसी अलौकिक, असाधारण या चमत्कारिक घटना के वर्णन से पाठक या श्रोता के हृदय में विस्मय (आश्चर्य) का भाव स्थायी रूप से उत्पन्न होता है, तो अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में ईश्वरीय चमत्कारों या दिव्य रूप के वर्णन में इस रस का उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।
- स्थायी भाव: विस्मय (आश्चर्य)
- देवता: वरुण
- वर्ण (रंग): पीत (पीला)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
अद्भुत रस का हिंदी साहित्य में सबसे उत्कृष्ट उदाहरण तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में श्रीराम के दिव्य रूप को देखकर मुनियों का विस्मित होना, या हनुमान जी द्वारा संजीवनी पर्वत उठाकर लाने का वर्णन है।
“राम-रूप निरखि मुनि बिह्वल, बचन न आवहिं कंठ।
कहहिं परस्पर आपुस में, धन्य-धन्य रघुकंठ।।”
— कवि: तुलसीदास (रामचरितमानस, बालकांड)
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: विस्मय (श्रीराम के अलौकिक रूप को देखकर उत्पन्न आश्चर्य)।
- आलंबन विभाव: श्रीराम (जिनका दिव्य रूप देखा जा रहा है)।
- उद्दीपन विभाव: श्रीराम का असाधारण सौंदर्य, तेज और दिव्य प्रभा।
- अनुभाव: मुनियों का विह्वल हो जाना, कंठ का अवरुद्ध (रुक) जाना, नेत्रों का फैल जाना, और आपस में ‘धन्य-धन्य’ कहना।
- संचारी भाव: हर्ष, गर्व, और धैर्य।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में अद्भुत रस के उदाहरण के रूप में ‘रामचरितमानस’ में हनुमान जी का संजीवनी पर्वत लाना या श्रीराम का विराट रूप देखना सबसे अधिक प्रामाणिक और सुरक्षित उत्तर माना जाता है।)
9. शांत रस (Shant Ras)

जब काव्य में सांसारिक मोह-माया से मुक्ति, वैराग्य या परम शांति का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो शांत रस की उत्पत्ति होती है। यह रस मानव मन को अलौकिक शांति और आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है। हिंदी साहित्य में संत काव्य (विशेषकर कबीर दास) और छायावाद (जयशंकर प्रसाद) में इसका उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।
- स्थायी भाव: निर्वेद (सांसारिक विषयों से उपरति या वैराग्य)
- देवता: विष्णु
- वर्ण (रंग): श्वेत (सफेद)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
शांत रस का हिंदी साहित्य में सबसे प्रामाणिक उदाहरण कबीर दास के those दोहे हैं जो संसार की नश्वरता और परम शांति की प्राप्ति का वर्णन करते हैं।
“सबै सपना संसार है, जागत सबै उदास।
जेहि सपना तेहि नहिं रहे, जागे तेहि नहिं नास।।”
— कवि: कबीर दास
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: निर्वेद (संसार की नश्वरता को जानकर उत्पन्न वैराग्य और शांति)।
- आलंबन विभाव: संसार, माया, या आत्मा का स्वरूप।
- उद्दीपन विभाव: संसार की असारता का ज्ञान, एकांत वातावरण, या आध्यात्मिक चिंतन।
- अनुभाव: आँखें मुंदना, ध्यानमुद्रा में बैठना, शरीर की चेष्टाओं का शान्त हो जाना, और मन की स्थिरता।
- संचारी भाव: स्मृति, धैर्य, समता, और हर्ष (आत्म-ज्ञान का आनंद)।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में शांत रस के उदाहरण के रूप में ‘कबीर के वैराग्यपूर्ण दोहे’ या ‘जयशंकर प्रसाद की कामायनी (श्रद्धा सुधा)’ के प्रसंग सबसे अधिक प्रामाणिक और सुरक्षित उत्तर माने जाते हैं।)
10. वात्सल्य रस (Vatsalya Ras)

जब काव्य में माता-पिता का अपने बालक के प्रति निःस्वार्थ, ममतामय और स्नेहपूर्ण भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो वात्सल्य रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में इस रस का सर्वोच्च शिखर भक्तिकालीन कवि सूरदास की ‘सूरसागर’ में यशोदा और बालकृष्ण के प्रसंगों में मिलता है।
- स्थायी भाव: स्नेह (ममता)
- देवता: ब्रह्मा
- वर्ण (रंग): श्वेत (सफेद)
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
वात्सल्य रस का हिंदी साहित्य में सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक उदाहरण सूरदास का वह पद है, जिसमें बालकृष्ण माखन चुराने के बाद यशोदा के सामने मासूमियत से मना करते हैं।
“मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।
ब्रज के बालक मोहिं लरिकावत, मैं तो नटवर नाहीं जायो।।
यह कहि-कहि रोवत अरुझत, पलटि-पलटि मुख मोहिं दिखायो।
सूरदास प्रभु की यह लीला, जसुमति हिये हरषायो।।”
— कवि: सूरदास (सूरसागर)
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: स्नेह (यशोदा का कृष्ण के प्रति अगाध ममतामय प्रेम)।
- आलंबन विभाव: बालकृष्ण (जिन पर स्नेह किया जा रहा है) और यशोदा।
- उद्दीपन विभाव: कृष्ण की मासूमियत, उनका रोना, और बार-बार मुख मोड़कर दिखाना।
- अनुभाव: यशोदा का हृदय प्रसन्न होना (हरषायो), कृष्ण को गले लगाना, या स्नेहपूर्वक डांटना।
- संचारी भाव: विश्वास, हर्ष, और चंचलता।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में वात्सल्य रस पूछे जाने पर ‘सूरदास’ और ‘यशोदा-कृष्ण’ के प्रसंग को ही सर्वोत्तम, मानक और सबसे प्रामाणिक उदाहरण माना जाता है।)
11. भक्ति रस (Bhakti Ras)

जब काव्य में ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा, समर्पण और अनुराग का भाव स्थायी रूप से व्यक्त होता है, तो भक्ति रस की उत्पत्ति होती है। हिंदी साहित्य में भक्तिकाल (विशेषकर सगुण भक्ति धारा) में इस रस का अद्वितीय और सर्वोच्च विकास हुआ है।
- स्थायी भाव: अनुराग या श्रद्धा
- देवता: भगवान (श्रीकृष्ण या श्रीराम)
- वर्ण (रंग): स्वर्ण या मिश्रित
📜 प्रामाणिक साहित्यिक उदाहरण (Authentic Literary Example)
भक्ति रस का हिंदी साहित्य में सबसे प्रसिद्ध और हृदयस्पर्शी उदाहरण मीराबाई के वे पद हैं, जिनमें उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अपने पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास को व्यक्त किया है।
“मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मुरली बजरावै सोई।।”
— कवि: मीराबाई
इस उदाहरण का रस-विश्लेषण (Ras Breakdown for Exams):
- स्थायी भाव: अनुराग (ईश्वर के प्रति गहरा, निःस्वार्थ प्रेम और आकर्षण)।
- आलंबन विभाव: गिरिधर गोपाल (श्रीकृष्ण, जो भक्त के आश्रयदाता हैं)।
- उद्दीपन विभाव: श्रीकृष्ण का मोर मुकुट धारण करना और मुरली बजाना।
- अनुभाव: भक्त का संसार के अन्य सभी मोह-माया को त्याग देना, केवल ईश्वर को ही अपना मानना, और भजन-कीर्तन में लीन हो जाना।
- संचारी भाव: विश्वास, दैन्य (विनम्रता), हर्ष, और धैर्य।
(शिक्षक की टिपणी: प्रतियोगी परीक्षाओं में भक्ति रस के उदाहरण के रूप में ‘मीराबाई के कृष्ण-पद’, ‘तुलसीदास के राम-पद’ या ‘सूरदास की भक्ति-भावना’ को ही सर्वोत्तम और मानक उत्तर माना जाता है।)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) – प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण
प्रतियोगी परीक्षाओं (CTET, RAS, UPSC, UGC NET) और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए ‘रस’ से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न नीचे दिए गए हैं:
रस किसे कहते हैं?
काव्य या साहित्य पढ़ने-सुनने से हृदय में जो खास भावों के साथ अलौकिक आनंद उत्पन्न हो, उसे ‘रस’ कहते हैं। सरल शब्दों में, रस कविता का वह स्वाद है जो मन को छू जाए।
रस के कितने अवयव होते हैं?
रस के चार मुख्य अवयव होते हैं—स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव। ये चारों मिलकर ही रस का संपूर्ण अनुभव कराते हैं।
रस के कितने प्रकार होते हैं और वह कौन-कौन से हैं?
रस मुख्य रूप से ग्यारह प्रकार के होते हैं—श्रृंगार, हास्य, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य और भक्ति। इन सभी रसों के अलग-अलग भाव और अनुभव होते हैं, जो साहित्य को रंग-बिरंगा बनाते हैं।
रस और भाव में क्या मुख्य अंतर है?
उत्तर: भाव मन की आंतरिक, व्यक्तिगत और कच्ची अनुभूति है, जो काव्य के बाहर (कवि या पात्र के मन में) होती है। इसके विपरीत, रस उसी भाव का परिपक्व, चमत्कारिक और सार्वजनिक रूप है, जो काव्य के माध्यम से पाठक या श्रोता के हृदय में अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है। सरल शब्दों में, ‘भाव’ कच्चा माल है और ‘रस’ पका हुआ व्यंजन।
भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में रस का मूल सूत्र क्या है?
उत्तर: भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र (अध्याय 6) में रस की उत्पत्ति का सूत्र इस प्रकार दिया है:
“विभावानुभावव्यक्तिसंचारिणः संयुक्त रसनिष्पत्तिं”
अर्थात्: विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति (उत्पत्ति) होती है।
हिंदी साहित्य में रस के कितने भेद माने जाते हैं?
उत्तर: भरत मुनि ने मूल रूप से 9 रसों का वर्णन किया है। हालाँकि, बाद के आचार्यों (जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल) ने वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर हिंदी साहित्य में कुल 11 रस माने हैं, जो वर्तमान NCERT पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं का मानक है।
विभाव और अनुभाव में क्या अंतर है?
उत्तर: विभाव वह ‘कारण’ है जिससे भाव जागृत होता है (जैसे: नायक-नायिका या चंद्रमा)। जबकि अनुभाव उस जागृत भाव को बाहर प्रकट करने वाली शारीरिक या मानसिक ‘चेष्टाएं’ या ‘परिणाम’ हैं (जैसे: नेत्रों का सिकुड़ना, रोमांच होना, या मुस्कुराना)।
हिंदी साहित्य में ‘रसराज’ किसे कहा जाता है और क्यों?
उत्तर: हिंदी साहित्य में श्रृंगार रस को ‘रसराज’ कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह रस मानव जीवन के सबसे मौलिक और शक्तिशाली भाव ‘प्रेम’ पर आधारित है, और इसमें अन्य रसों के संचारी भावों को समाहित करने की अद्वितीय क्षमता होती है। आचार्य विश्वनाथ ने इसे “काव्यस्य आत्मा रसः” (काव्य की आत्मा रस है) कहकर इसका महत्व प्रतिपादित किया है।







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